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 स्वास्थ्य परीक्षण शिविर में 348 रोगियों की हुई जांच

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सहारनपुर 20 मार्च (ब्यूरो)। भारत विकास परिषद की आयोजित स्वास्थ्य परीक्षण शिविर में 348 हृदय व पेट रोगियों की जांच की गयी। आज परिषद द्वारा आयोजित शिविर में वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डा. अमित मित्तल ने कहा कि सही खानपान व संतुलित दिनचर्या से हृदय रोगों से बचा जा सकता है। पेट रोग विशेषज्ञ डा. विशाल गर्ग ने कहा कि कुछ समय बाद खाने का तेल बदल लेना चाहिए। सिग्रेट आदि का सेवन न करें तभी पेट रोगों से मुक्ति मिल सकती है ।परिषद अध्यक्ष मनोज जैन ने बताया कि आम लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता लाये जाने के उद्देश्य से शिविर का आयोजन किया गया है। शिविर में रेागियों की निःशुल्क जांच की गयी है। इस अवसर पर हृदय व पेट रोगों से सम्बन्ध्ति 348 मरीजों की जांच की गयी। इस दौरान हंस कुमार, संजय मित्तल, वीरभान भटेजा, कमल राज, अशेाक मित्तल, भरतेश जैन, राजेश गुप्ता, अनिल गुप्ता, दिनेश गोयल, नीरज मिडढा, गौरव जैन, मनोज मित्तल, संजीव गोयल, रीतू गोयल, रीना जैन, मंजू मित्तल, पूनम सिंघल, संजय सिंघल, रूची मित्तल आदि मौजूद रहे। संस्था की ओर से चिकित्सकों को स्मृति चिन्ह भेंट किया गया।

अवसादरोधी दवाओं से दांतों के इंप्लांट होते हैं असफल

न्यूयाॅर्क, 10 मार्च। अवसादरोधी दवाएं चिंता, दर्द व अन्य विकारों के उपचार के लिए धड़ल्ले से प्रयोग की जाती है, लेकिन इससे हड्डियों के विकास को खतरा हो सकता है और दांतों का इंप्लांट भी विफल हो सकता है। एक शोध से यह जानकारी सामने आई है। अमेरिकी शोधकर्ताओं ने पाया कि अवसादरोधी दवाओं के प्रयोग से दांतों के इंप्लांट के असफल होने की संभावना चार गुणा बढ़ जाती है। हर साल अवसाधरोधी दवाओं के कारण दांतों के इंप्लांट की विफलता की दर दोगुनी हो जाती है। एक तरफ जहां ये दवाएं मूड और भावनाओं के प्रबंधन में उपयोगी हैं, वहीं दूसरी तरफ इससे हड्डियों का मेटाबालिज्म बिगड़ जाता है जो टूट-फूट को भरने की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है। प्रमुख शोधकर्ता बफैलो विश्वविद्यालय की सुलोचना गुरुंग का कहना है, “सही ढंग से घाव भरने के लिए प्रभावित जगह के इर्द-गिर्द नई हड्डियों का निर्माण होने बेहद जरूरी है। लेकिन अवसादरोधी दवा इस प्रक्रिया को प्रभावित करता है।“ यूबी दंत चिकित्सालय के मरीजों को 2014 में अध्ययन करने के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन थोड़े बहुत मरीजों का दंत इंप्लांट असफल रहा था, उनमें से 33 फीसदी ने अवसादरोधी दवाओं का प्रयोग किया था। जिन मरीजों का दंत इंप्लांट सफल रहा था, उनमें से केवल 11 फीसदी ने अवसादरोधी दवाएं ली थी। यह शोध लास एंजिलिस में 19 मार्च को होने वाले 45वें सालाना अमेरिकन एसोसिएशन फाॅर डेंटल रिसर्च में प्रस्तुत किया जाएगा।

बीपी, ब्लड शूगर हो काबू में तो सताएगा नहीं गुर्दारोग

नई दिल्ली, 23 फरवरी । देश में क्रानिक किडनी रोग या सीकेडी बढ़ रहा है और अगर समय रहते हम सचेत न हुए तो हमारी किडनी की कार्यप्रणाली क्षतिग्रस्त हो सकती है, किडनी फेल भी हो सकती है और डायलसिस पर निर्भर रहना पड़ सकता है या किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के बयान में कहा गया कि डायबिटीज और हाईपरटेंशन दो ऐसी समस्याएं हैं जो क्राॅनिक किडनी रोग के प्रमुख कारण हैं। हाई ब्लड प्रेशर और हाई ब्लड शूगर पर नियंत्रण करके सीकेडी के 50 प्रतिशत मामलों और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से बचा जा सकता है जिसमें जान जाने का भी खतरा होता है। आम तौर पर क्राॅनिक किडनी रोग के लक्षण नजर नहीं आते और अचानक कभी ब्लड या यूरीन टेस्ट करवाने से इसका पता चलता है।
इस बारे में आईएमए के मानद महासचिव डा‚.के.के. अग्रवाल ने कहा कि क्राॅनिक किडनी रोग एक मूक मारक है, जो एक आम व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता को नष्ट कर देता है। इसलिए जरूरी है कि क्राॅनिक किडनी रोग की जांच जल्दी हो जाए ताकि इसका इलाज हो सके। उन्होंने कहा, ‘हम अपनी किडनियों को बचा सकते हैं, अगर अपना निम्नतम ब्लड प्रेशर और भूखे पेट ब्लड शूगर 80 पर बनाए रखें। वजन संतुलित रखें। हर साल किडनी की जांच करवाएं और डाॅक्टर से ईजीएफआर टेस्ट के लिए कहें। किडनी के नुकसान की जांच जल्दी से जल्दी करवाएं।

दांतों के रोगों से बचाव की जानकारी दी

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सहारनपुर 21 फरवरी(ब्यूरो)। इंडियन डेंटल एसोसिएशन ब्रांच द्वारा गोष्ठी का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम में देहरादून से आये मुख्य अतिथि डा. नितिश काम्बोज ने बताया कि लेजर द्वारा दांतों की विभिन्न समस्याओं का दर्द रहित व सफलता पूर्वक इलाज संभव है। डा. अमित मिगलानी ने भी दांतों के विभिन्न रोगों पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान एसोसिएशन अध्यक्ष डा. आशीष जैन, डा. हरमनप्रीत, अनुप्रिया, वैशाली जैन, ऋषि रंजन, डा. लूथरा, मनप्रीत बतरा, पंकज खन्ना, विक्रांत, मोहित कपूर, नैन्सी मिगलानी, मुकेश नौसरान, रमनदीप सिंह, डा. निधि चाननना, हरमीत मनोचा, अनुराधा मैनी, अंकित बुद्धिराज, वैभव वर्मा, दीपांकर चावला, पियूष जैन, डा. गौरव मित्तल, मौ. फैसल, दिविशा शर्मा आदि मौजूद रहे।

थूक, पेशाब से फैल सकता है जीका वायरस

ब्रसिलिया, 06 फरवरी। ब्राजीलियाई शोधकर्ताओं को जीका वायरस के रोगियों के थूक और पेशाब में इस रोग के लक्षण मिले हैं। इसका अर्थ है कि यह विषाणु थूक और पेशाब के माध्यम से फैल सकता है। समाचार एजेंसी सिन्हुआ की शनिवार की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्राजील के विश्वविख्यात जन स्वास्थ्य शोध संस्थान ‘ओसा क्रूड फांउडेशन‘ (फिस्क) के अध्यक्ष प‚लो गवेल ने शुक्रवार को इसकी घोषणा की। गवेल ने कहा कि इसे साबित करने के लिए और परीक्षणों की जरूरत है। इस चेतावनी के बाद ब्राजील के स्वास्थ्य मंत्रालय ने सलाह दी कि लोगों को किसी अन्य व्यक्ति के टूथब्रश, गिलास जैसी निजी चीजों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और अपने हाथ बार-बार धोने चाहिए। मंत्रालय ने कहा कि थूक और पेशाब से विषाणु के फैलने की संभावना का अर्थ यह नहीं है कि एडीज एजिप्टी मच्छरों के पनपने को रोकने के उपाय कम कर दिए जाएं, क्योंकि ये न केवल जीका, बल्कि चिकनगुनिया और डेंगू रोग उत्पन्न करने के लिए भी जिम्मेदार हैं।

जीका वायरस ने निपटने के लिये स्वास्थ विभाग ने कसी कमर

कानपुर, 06 फरवरी। शनिवार को जीएसवीएम मेडिकल कालेज के एलटी-1 सभागार में जीका से निपटने के लिये कार्यशाला आयोजित की गयी। दुनिया भर में जीका वायरस तेजी से फैल रहे संक्रमण को देखते हुए शहर में भी स्वास्थ महकमा सतर्क हो गया है। सीएमओं की ओर से भी सभी सरकारी अस्प्तालों और नर्सिंगहोम के लिये जीका वायरस से निपटने के लिये गाइड लाइन जारी कर दी गयी है। इसके तहत खांसी, जुकाम या साधारण बीमारी वालों को भी गंभीरता से लेने को कहा गया है। गर्भवती महिलाओं के मामले में विशेष संजीदगी बरतने को कहा गया है। जिन शहरो में एडीज मच्छरों का प्रभाव पहले देखने को मिला है या डेंगू-मलेरिया के ज्यादा मरीज पाये गये है उन शहरों में खास एतिहात बरती जा रही है।
विश्व स्वास्थ संगठन का कहना है कि यह वायरस दक्षिण और उत्तरी अमरीकी महाद्वीपो के सभी क्षेत्रों में फैल सकता है। यह पहले ही 21 कैरैबियाई उत्तर और दक्षिण अमेरीकी देशों में फैल चुका है। वायरस के लक्षणों में बुखार, कनजंक्टिवाइटिस और सरदर्द शामिल है। यह बीमारी यौन रोगो से भी फैला है। अस्सी प्रतिशत मामलों में इस रोग के लक्षण दिखते ही नही है। लेकिन इसका बड़ा असर अजन्मे बच्चों में देखने को मिल रहा है। ब्राजील में इस वायरस से शिशु सामान्य से छोटे सिरों के साथ पैदा हो रहे है।

अवसादरोधी दवाएं बच्चों को बना सकती हैं आक्रामक

लंदन, 28 जनवरी। अवसादरोधी दवाएं बच्चों और किशोरों को आक्रामक बना सकती हैं, यहां तक कि उनमें आत्महत्या की प्रवृत्ति भी पनप सकती है। एक शोध में यह चेतावनी दी गई है। डेनमार्क के शोधकर्ताओं के मुताबिक, अवसादरोधी दवाओं से बच्चों और किशोरों में आक्रामकता और आत्महत्या की प्रवृत्ति का खतरा दुगना हो जाता है। हालांकि उन्हें अवसादरोधी दवाओं और आक्रामकता व अवसाद में कोई सीधा संबंध नहीं मिला। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए शोधदल ने 18,526 मरीजों की जांच की। जांच के दौरान उन्हें अवसादरोधी दवाएं दी गई थीं। यह शोध बीएमजे नाम के जर्नल में प्रकाशित किया गया है। इसमें सिफारिश की गई है कि बच्चों, किशोरों और नवयुवकों को कम से कम अवसादरोधी दवाएं देनी चाहिए, क्योंकि इससे उन्हें गंभीर हानि पहुंच सकती है। इसलिए अवसाद का इलाज दवाओं के जरिए करने की बजाय वैकल्पिक इलाज जैसे व्यायाम और साइकोथेरेपी पर जोर देना चाहिए।

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