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मैं पीढ़ियों के अन्तर को नहीं मानताः अमिताभ बच्चन

मैं पीढ़ियों के अन्तर को नहीं मानताः अमिताभ बच्चन

बाॅलीवुड का वजीर

सौमित्र शर्मा

मुम्बई 09 जनवरी। उम्र के इस पड़ाव में भी ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म सात हिन्दुस्तानी से अपने कैरियर की शुरूआत करने वाले अमिताभ बच्चन ने पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना को बहुत पीछे छोड़ दिया और जुबली कुमार रहे राजेन्द्र कुमार ने भी उनका लोहा माना था।
बिद्यु विनोद चोपड़ा की हालिया रिलीज फिल्म ‘वजीर’ को देखने के बाद यह कहा जा सकता है कि अमिताभ बच्चन आज निश्चित रूप से बालीवुड के ‘वजीर’ बने हुये हैं।
इसे संयोग ही कहा जायेगा कि एक समय में जंजीर, शोले और दीवार जैसी फिल्में लिखने वाले जावेद अख्तर के बेटे फरहान अख्तर के साथ वह अभिनय करते नजर आते हैं लेकिन कहीं से ऐसा नहीं लगता है कि वह चूक गये हैं या अपने को थका हुआ महसूस कर रहे हैं।
जब उनसे पूछा गया कि पीढ़ियों के अन्तर को वह किस तरह से देखते हैं तो उन्होंने साफ तौर पर कहा कि मैं पीढ़ियों के अन्तर को नहीं मानता हर पीढ़ी का अपना महत्व होता है। उन्होंने कहा कि जावेद साहब आज भी कहानी और कविताएं लिख रहे हैं उनकी रचना प्रक्रिया अपने हिसाब से चल रही है लेकिन फरहान अपनी कला यात्रा को अलग तरह से जी रहे हैं।
बाॅलीवुड में कुछ लोग ऐसे भी है जिन्होंने शुरू में अमिताभ बच्चन के साथ काम किया लेकिन बाद में अपने कारणों से उनसे किनारा लिया जब इस पर उनसे सवाल किया गया तो अमिताभ ने कभी उनकी आलोचना नहीं की। जब इस क्रम में शत्रुघन सिन्हा का नाम आया तो उन्होंने कहा कि वह मुझसे काफी वरिष्ठ हैं उनके साथ बहुत रहा हूँ फिर वह राजनीति में पापुलर हो गये मैं राजनीति में अनफिट रहा लेकिन अमिताभ ने कभी अपने प्रति द्वन्दी की बुराई नहीं की।
शत्रुधन सिन्हा ने पिछले दिनों अपने जीवन पर एक किताब प्रकाशित की है उनसे जब पूछा गया कि क्या वह इस तरह की कोई बायोग्राफी लिखना चाहते हंै तो उन्होंने साफ तौर पर कहा कि नहीं यह मेरा काम नहीं है, मैं केवल अपने दर्शकों के लिये काम करना चाहता हूँ वैसे भी मेरा जीवन एक खुली किताब है। वजीर के बाद अभिताभ सुजीत सरकार की फिल्म करेंगे। फिर टीवी का एक बड़ा शो भी पाईप लाईन में लगा है।
फरहान अख्तर की फिल्म वजीर क्या किसी शतरंज खिलाड़ी के जीवन पर आधारित है? या ये शतरंज खेल को प्रोत्साहन देने के लिए है? ये बातें आपके दिमाग में भी आई होंगी। लेकिन अगर आप फिल्म का ट्रेलर देखें तो साफ पता चलता है कि यह एक थ्रिलर फिल्म है। लेकिन जब आप फिल्म देखेंगे तो लगेगा कि यह एक मर्डर मिस्ट्री है, जिसमें सीन दर सीन राज से धीरे-धीरे परदा उठता है और क्लाईमैक्स में इंसान सीट से हिल नहीं सकता।
ये कहानी है दिल्ली पुलिस के एक एटीएस अफसर दानिश अली (फरहान अख्तर) की, जिसकी छह साल की बेटी नूरी की एक हादसे में मौत हो जाती है। इस हादसे के लिए दानिश की पत्नी रूहानी (अदिति राव हैदरी) उसे ही जिम्मेदार मानती है और उससे दूर चली जाती है। अकेला पड़ गया दानिश अपने एक साथी सरताज (अंजुम शर्मा) के घर रहने लगता है। तमाम कोशिशों के बावजूद वह नूरी की मौत को नहीं भुला पाता और एक दिन उसकी कब्र पर जाकर आत्महत्या करने की कोशिश करता है, लेकिन ऐन मौके पर उसे कोई परेशान करता है। दानिश को वहां किसी का पर्स मिलता है। वह पर्स लौटाने जिस पते पर जाता है, वहां उसकी मुलाकात होती है पंडित जी से (अमिताभ बच्चन), जिनका पूरा नाम है ओंकार नाथ धर। पंडित जी शतरंज के खिलाड़ी हैं और वो दानिश को बताते हैं कि नूरी उनके यहां शतरंज सीखने आती थी। दानिश और पंडित की दोस्ती हो जाती है। एक दिन पंडित, दानिश को बताता है कि उसकी जवान बेटी नीना की भी एक हादसे में मौत हो गयी थी। दुनिया के लिए यह एक हादसा था, लेकिन पंडित के अनुसार उसकी बेटी की हत्या हुई थी, जिसका जिम्मेदार वह यजाद कुरेशी को मानता है। यजाद एक मंत्री है और जम्मू-कश्मीर का एक चर्चित नेता भी। यजाद की एक अलग कहानी है, जो उसके रहस्यमयी राजनीतिक करियर के स्याह-सफेद पहलुओं के बीच घिरी है।
दानिश और पंडित की यारी रंग पकड़ने लगती है और एक दिन पंडित को पता चलता है कि नीना की केस फाइल बंद कर दी गयी है। वह गुस्से में यजाद से बदला लेने निकल पड़ता है। तभी पंडित पर यजाद का एक प्यादा वजीर (नील नितिन मुकेश) हमला कर देता है। ऐसे हमले और भी होते हैं। वजीर, दानिश को भी मामले में लपेट लेता है और धमकी भरे फोन करता रहता है। वह दानिश को कहता है कि पंडित को कश्मीर जाने से रोक ले। दानिश जब पंडित को रोक पाता है तब तक देर हो चुकी होती है। उसे एक पेन ड्राइव मिलती है, जो सारे राज खोल देती है।
बिजाॅय नाम्बियार युवा निर्देशकों की उस खेप में से हैं, जो अपनी अलग शैली और न्यू ऐज सिनेमा के लिए जाने जाते हैं। ‘शैतान’ और ‘डेविड’ जैसी फिल्मों से उन्होंने खासा ध्यान खींचा है। नामचीन कलाकारों और बजट के लिहाज से ‘वजीर’ उनकी अब तक की सबसे बड़ी फिल्म कही जा सकती है। फिल्म की कहानी-कथानक में विधु विनोद चोपड़ा जैसे फिल्मकार का स्पर्श है, जो ‘परिंदा’ जैसे डार्क थ्रिलर के लिए जाने जाते हैं। लेकिन तमाम उत्सुकताओं के बावजूद यह फिल्म बहुत ज्यादा चैंकाती तो नहीं है, पर बांधे रखती है। इसकी एकमात्र वजह है कि फिल्म के दो शीर्ष कलाकार। अमिताभ और फरहान की जोड़ी में दम है। दोनों अंत तक बांधे रखते हैं। संवादों से अपनी अभिनय अदायगी से और कथानक के रोमांच से यह पौने दो घंटे की फिल्म निराश नहीं करती है।
फिल्म दिल्ली में फिल्माई गयी है। इसकी पृष्ठभूमि भी दिल्ली ही है। सर्दी और बरसात के दिन, दिल्ली पुलिस का कामकाज, सांस्कृतिक गतिविधियां आदि से फिल्म में अलग माहौल बन जाता है, जो परदे पर सुखद अनुभव देता है। लेकिन जब अंत में पंडित और वजीर के किरदार की परतें उतरनी शुरू होती हैं तो ऐसा लगता है कि यह सब कितने ‘सुविधाजनक’ ढंग से हो गया है।
अदिति राव हैदरी काफी नियंत्रण में लगी हैं। उनकी बोल्ड इमेज रूहाना के किरदार से कोसों दूर रही है। फरहान ने एक दुखी पिता और जाबांज अफसर की भूमिका अच्छे से निभाई हे। बिग बी के लिए अब ऐसे रोल करना बेहद सहज हो गया है। उन पर हर अंदाज सूट करता है। फिर भी एक कमी लगती है कि एक अपाहिज इंसान एक तेज तर्रार अफसर को अपने मकसद के लिए इतनी आसानी से अपना प्यादा कैसे बना सकता है? शायद जब लेखन में ‘सुविधाजनक’ कोण और त्रिकोण होते हैं, तो ऐसा ही होता है।

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