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मैं साजिशों का शिकार रही हूँ।-कंगना

मैं साजिशों का शिकार रही हूँ।-कंगना
सौमित्र शर्मा
मुम्बई।

बीते साल के बारे में आप किस तरह से सोचती हैं, कैसा लगता है?

बीता साल मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण रहा। अकसर लोग हमारे करियर ग्राफ के उतार-चढ़ाव या फिल्मों के फ्लोप-हिट से हमारा मूल्यांकन करते हैं। लेकिन अभियन मेरी जिंदगी का एक छोटा-सा पहलू है। मैंने अभी-अभी मनाली (हिमाचल प्रदेश) में एक छोटा-सा घर बनाना शुरू किया है, जो मेरे लिए अपनी जड़ो संग जुड़ने सरीखा है। अपने घर की पहली ईंट रखना न केवल एक अहम निर्णय है, बल्कि एक भावनात्मक कदम भी। मुंबई में भी मेरा एक घर है और दुनिया में कहीं भी हो सकता है, लेकिन हिमाचल के लोग जब मुझे ‘हिमाचल की बेटी’ कह कर पुकारते हैं तो मैं उनके स्नेह और प्यार से अभिभूत हो जाती हंू।
सुना है कि आप फिल्मों के अलावा कई अन्य कार्यों में भी व्यस्त रहीं?

हां, ये सही है कि फिल्मों के आलावा मेरी व्यस्तता कई अन्य कार्यों में भी रही, जिनमें से एक महत्वपूर्ण कार्य रहा ‘फेस आॅफ न्यू इंडिया’। इसके तहत मैंने अंतराष्ट्रीय मंच पर देश का प्रतिनिधित्व किया। मैं ऐसे ही कुछ और कार्य भी करना चाहती हूं, मैं केवल एक अभिनेत्री नहीं हूं। जैसे कि मैं हमेशा से ही आॅर्गेनिक फार्मिंग करना चाहती थी, इसलिए मैंने अब मनाली में एक फार्म लगाया है।
किसी कार्यक्रम या शो के बारे में बताएं, जहां आपको एक अभिनेत्री से परे कोई अलग तरह का एहसास हुआ हो?

कंगना रनोट को देख कर कभी-कभी ‘दि डर्टी पिक्चर’ की सिल्क की याद आती है, जो अपनी शर्तों पर जीना चाहती है। किसी के आगे झुकना उसे कतई गवारा नहीं है। मौजूदा दौर में कंगना सबसे ज्यादा फीस (करीब 11 करोड़ रू0) लेने वाली अभिनेत्री हैं।
मैं हमेशा से ही एक तेज-तर्रार वक्ता बनना चाहती थी। हालांकि मैं कोई वक्ता हूं नहीं, लेकिन मैंने पिछले साल हिन्दूस्तान टाइम्स द्वारा आयोजित लीडरशिप समिट और हिन्दुस्तान द्वारा आयोजित हिन्दुस्तान शिखर समागम में शिरकत की। इस लिहाज से बीता साल बहुत अद्भुत रहा और कुल मिलाकर करियर के हिसाब से काफी संतुलित।

जब आपको किसी कार्य के लिए सराहा जाता है, पुरस्कार दिये जाते हैं या सम्मानित किया जाता है तो कहीं न कहीं एक तरह की। नकारात्मकता का सामना भी उतने ही आवेग से करना पड़ता है?

हां, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस तरह की बातों को मैं ठीक से संभाल सकती हूं। पीछे मुड़ कर देखती हूं तो मुझे लगता है कि जैसे वो मुझे किसी बात के लिए उकसाना चाहते थे और मैंने वैसे ही किया। मैंने प्रतिक्रिया दी और जोरदार ढंग से दी।

इतनी सारी चाजों का सामना करने के बाद आपको कैसा महसूस होता है?
पीछे मुड़ कर देखती हूं तो कई बातों का दुख भी होता है, लेकिन इस बात का एहसास भी होता है कि मैं ऐसी ही हूं। जिंदगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है और बहुत कुछ सीखना बाकी है। मुझे उन चीजों को आगे साथ लेकर जाने की जरूरत बिल्कुल नहीं है।

इस तरह के अनुभव के बाद कैसा लगता है? क्या जरूरत से ज्यादा सच की पैरवी करना जोखिमभरा होता है?
इस बात से मैं सहमत नहीं हूं। मैं जब इस शहर में आयी थी तो मुझे एक बात अच्छी तरह से पता थी कि मुझे सहारा देने वाला कोई नहीं है। शायद यही वजह भी रही कि मैं तमाम चीजों को पूरे विश्वास के साथ कर सकी, वो भी ऐसी सूरत में जब आप अकेली हों और आपके पिता के पास ढेर सारी धन-दौलत और वो प्रभावशाली भी न हों। ऐसे में आपके पास जीने के लिए बस एक ही रास्ता बचता है कि आप बस चलते जाएं। अपनी शर्तों पर जिएं।

अकसर फिल्म सितारों के बयान पर विवाद हो जाता है?
मुझे लगता है कि हम भारतीयों को पुरानी, घिसी-पिटी बातों पर रोने की एक आदत-सी पड़ गयी है। हर बात पर कोई हमें सांत्वना दे, वगैरह वगैरह…. हमें ऐसी ही शख्सियतें पसंद आती है।

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