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होठों को पढ़ने की नई तकनीक विकसित

लंदन, 25 मार्च। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे होठों के संचालन से बोली गई बात का पता लगाया जा सकता है। पूर्वी अंगलिया विश्वविद्यालय (यूईए) के वैज्ञानिकों ने यह तकनीक विकसित की है। यह तकनीक मूक और बधिरों के साथ संवाद करने में काफी काम की साबित हो सकती है। खासतौर से तब जब उनके साथ कोई अपराध हुआ हो तो वे इसकी मदद से पूरा ब्योरा बता सकेंगे। यह विजुअल स्पीट तकनीक डाॅ हेलेन एल. बेयर और प्रोफेसर रिचर्ड हार्वे ने मिलकर विकसित किया है। यह वहां भी प्रभावी है जहां आवाज साफ सुनाई नहीं दे रही हो। वहां यह बड़ी आसानी से पता लगा सकता है कि लोग क्या कह रहे हैं। यह तकनीक सीसीटीवी फुटेज के विश्लेषण में भी काफी उपयोगी साबित हो सकती है। डाॅ बेयर बताते हैं, हम अभी भी विजुअल स्पीच को समझने की प्रक्रिया में हैं। हालांकि यह तकनीक अभी सौ फीसदी कारगर नहीं है। लेकिन यह काफी काम का है। यह शोध एकोस्क्सि, स्पीच और सिग्लन प्रोसेसिंग के बारे में शंधाई में
शुक्रवार को हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया।

धरती पर जीवन की उत्पत्ति का नया सिद्धांत आया सामने

न्यूयाॅर्क, 05 फरवरी (एजेंसी)। भारतीय मूल के एक शोधार्थी सहित वैज्ञानिकों की एक टीम ने धरती पर जीवन की उत्पत्ति के बारे में नया सिद्धांत पेश किया है। वैज्ञानिकों के दल ने धरती पर जीवन की उत्पत्ति के संबंध में ब्रह्माण्डीय रासायनिक प्रतिक्रियाओं का बिल्कुल नया रूप सामने रखा है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि धरती पर काष्ठ आल्कोहल के रूप में पहचाना जाने वाला मिथेन का एक यौगिक मेथेन‚ल, मिथेन से भी ज्यादा प्रतिक्रियाशील है। प्रयोगों और गणना के जरिए वैज्ञानिकों ने यह प्रदर्शित किया कि मेथेन‚ल विभिन्न किस्म के हाईड्रोकार्बन यौगिकों और उसके उत्पादों, जिनमें हाइड्रोक‚र्बन के आयन (कार्बोकेशन और कार्बेनियन) भी शामिल हैं, के विकास में सहायक हो सकता है। साऊथ कैरोलीना विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र विभाग के मुख्य शोधकर्ता जाॅर्ज ओलाह और जी.के. सूर्य प्रकाश का मानना है कि जब उल्का पिंडों और क्षुद्र ग्रहों के जरिए हाईड्रोकार्बन और अन्य उत्पाद धरती पर आए तो यहां अनोखी ’गोल्डीलाक’ जैसी स्थिति बनी। नतीजा यह हुआ कि धरती पर पानी, सांस लेने योग्य वातावरण बनने के साथ-साथ तापमान नियंत्रित हो गया जिससे जीवन की शुरुआत हुई। ब्रह्मांड के निर्माण के शुरुआती क्षणों में महाविस्फोट से उत्पन्न ऊर्जा से हाइड्रोजन और हिलियम गैसें बनीं। अन्य तत्वों की उत्पत्ति बाद में ग्रह के गर्म भाग से हुई जिनमें हाईड्रोजन के रूपांतरण से ही नाईट्रोजन, कार्बन, आॅक्सीजन और अन्य तत्वों की उत्पत्ति हुई। वैज्ञानिकों का कहना है कि लाखों वर्ष बाद जब सुपरनोवा विस्फोट हुआ तो अंतरिक्ष में ये तत्व फैल गए जिनसे जल, हाईड्रोकार्बन यौगिक जैसे मिथेन और मेथेन‚ल का निर्माण हुआ। लेकिन कैसे इन जटिल हाईड्रोकार्बन यौगिकों का निर्माण हुआ और इनसे जीवन की शुरुआत हुई एक खुला प्रश्न है।

कैसे सहेजता है मानव मस्तिष्क जानकारियों के अकूत भंडार को

न्यूयार्क, 17 दिसम्बर (एजेंसी)। भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक के नेतृत्व में किए गए एक ताजा अध्ययन में उस रहस्य को ढूंढ निकाला है कि मानव मस्तिष्क जानकारियों के अकूत भंडार को कैसे सहेजता है। जाॅर्जिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन से पता चला है कि कैसे मानव मस्तिष्क जानकारियों के समूह में महत्वपूर्ण जानकारी का वर्गीकरण करता है। वैज्ञानिकों ने मानव के सीखने की प्रक्रिया को समझने के लिए एल्गोरिथम खोज निकाला है। इस विधि का उपयोग मशीन लर्निग, आंकड़ों को विश्लेषण और कंप्यूटर दूरदर्शिता में किया जा सकता है। संतोष वेंपला के अनुसार, “इस शोध के दौरान यह जानने की कोशिश की गई है कि हम कैसे अपने आस-पास की अलग-अलग जानकारियों को शीघ्र और मजबूती के साथ समझ लेते हैं।“ संतोष कहते हैं कि बुनियादी स्तर पर मानव ने यह सब कैसे करना शुरू किया? इसे समझना एक जटिल समस्या है। वेंपाला और उनके सहयोगियों ने इस परीक्षण के लिए कुछ प्रतिभागियों से पूछे गए प्रश्नों के दौरान प्रश्नों से संबंधित दो तस्वीरें उन्हें दिखाईं, जिसमें से एक तस्वीर स्पष्ट और दूसरी अमूर्त थी। उसके बाद उनसे प्रश्न से संबंधित तस्वीर को सही-सही पहचानने के लिए कहा गया।
उन्होंने बताया कि हमारी कल्पना थी कि ’रैंडम प्रोजेक्शन’ की सहायता से हम मानव मस्तिष्क की सूचनाओं को समझने की प्रक्रिया को जान सकते हैं। और हमारी कल्पना सही साबित हुई और इसके आधार पर हम कह सकते हैं कि मानवों के लिए कुल जानकारी का मात्र 0.15 प्रतिशत हिस्सा भी काफी होता है। अगले चरण में वैज्ञानिकों ने कंप्यूटेशनल एल्गोरिथम की जांच मशीनों पर भी की। मशीनों ने मानवों के अनुरूप ही अच्छा प्रदर्शन किया। वैज्ञानिक बताते हैं, “हमें इस बात का सबूत मिला है कि मानवों और मशीनों का तंत्रिका नेटवर्क समान व्यवहार करता है।“ यह मानवों के साथ ’रैंडम प्रोजेक्शन’ का पहला अध्ययन माना जा रहा है और यही इस अध्ययन की खास बात है। वेंपाला का कहना था, “हम मानवों और मशीनों के तंत्रिका तंत्र के बीच इतनी समानता देखकर हैरान रह गए।“ यह अध्ययन शोध पत्रिका ’न्यूरल कंप्यूटेशन’ (एमआईटी) के आगामी अंक में प्रकाशित किया जाएगा।

पूर्वी अंटार्कटिका की प्राचीन झील पर जमी बर्फ 1.4 करोड़ वर्ष पुरानी

न्यूयाॅर्क, 17 दिसम्बर (एजेंसी)। एक नवीन तकनीक का प्रयोग कर वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका की प्राचीन झील पर जमी बर्फ की चादर के बनने की तिथि का पता लगाया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पूर्वी अंटार्कटिका में बर्फ की यह चादर 1.4 करोड़ वर्ष पुरानी है। यह शोध उस धारणा का समर्थन करता है जिसके अनुसार, 30-50 लाख साल पहले प्लियोसीन (अतिनूतन काल) युग के दौरान भी बर्फ की यह चादर बड़े स्तर पर नहीं पिघली थी, हालांकि तब कार्बन डाइआॅक्साइड की सांद्रता आज ही के समान थी। अमेरिका की पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर जेन विलिनबिं्रग का कहना है, “प्लियोसीन युग की तुलना कभी-कभी उस धारणा से की जाती है जहां ग्लोबल वाॅर्मिग के लगातार बढ़ने पर पृथ्वी पर होने वाली बड़ी प्राकृतिक घटनाओं के बारे में सोचते हैं।“ विलिनबिं्रग के अनुसार, “यह शोध हमारी उस उम्मीद को बल देता है जहां पूर्वी अंटार्कटिका की बर्फ की चादर वर्तमान और भविष्य के मौसमों के अनुसार टिकी रह सकती है।“ कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यह बर्फ की चादर प्लियोसीन युग के दौरान कुछ स्थितियों में पिघली थी। वहीं कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यह चादर पूरी तरह से लगभग 1.4 करोड़ सालों से जमी है। विलिनबिं्रग और उनके सहयोगियों ने हालांकि इसके इतिहास को स्पष्ट करने की आशा व्यक्त की है। इसके लिए उन्होंने महाद्वीप के पूर्वी हिस्से के मध्य सूखी घाटियों में स्थित अंटार्कटिका के फ्रिस पहाड़ों की यात्रा की है। इस झील की लगभग पैर के बराबर मोटी बर्फ की चादर के नीचे सतह पर विभिन्न पदार्थो का जमाव है, और यह मीठे पानी और विभिन्न जीवाश्मों के लिए जानी जाती है। इस नई तकनीक की सहायता से वैज्ञानिक झीलें के उन विभिन्न पदार्थो की आयु का आकलन कर पाए हैं और वैज्ञानिकों के अनुसार इन पदार्थो की आयु 1.4 करोड़ साल से 1.75 करोड़ साल के करीब हैं। विलिनबर्ग कहते हैं कि इसका मतलब है कि यह पदार्थ उस समय की तुलना में काफी प्राचीन है जहां लोग यह सोच रहे हैं कि अंटार्कटिका पर ग्लेशियर कम हो रहे हैं। इससे साबित होता है कि अंटार्कटिका में ग्लेशियरों के पिघलने की जो धारणाएं सामने आ रही हैं वह पूरी तरह सही नहीं हैं। यह शोध पत्रिका साइंटिफिक रिपोट्र्स में प्रकाशित हुई है।

दुनिया का पहला डेंगू रोधी टीका लांच

मेक्सिको सिटी, 10 दिसम्बर (एजेंसी)। मेक्सिको ने दुनिया का पहला डेंगू रोधी टीका बाजार में उतारा है। यह टीका सामान्य डेंगू के खिलाफ 60.5 प्रतिशत और गंभीर लक्षणों वाले डेंगू के खिलाफ 93.2 प्रतिशत तक प्रभावी है। मेक्सिको के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि यह दुनिया का पहला मान्यताप्राप्त डेंगू रोधी टीका है। इसे दो साल तक मेक्सिकोवासियों सहित दुनियाभर के 40,000 से अधिक मरीजों पर नैदानिक परीक्षण के बाद मंजूरी दी गई। बयान के मुताबिक, “इस टीके का इस्तेमाल कर डेंगू से पीड़ित 8,000 से अधिक लोगों को अस्पताल में भर्ती होने से बचाया जा सकता है, सालाना 104 लोगों की जान बचाई जा सकती है। साथ ही प्रति वर्ष चिकित्सा पर होने वाले 1.1 अरब पेसो (6.4 करोड़ डलर) के खर्च को भी बचाया जा सकता है।“ विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, दुनिया की करीब 40 प्रतिशत आबादी (3.9 अरब लोग) को डेंगू होने का खतरा है। मच्छर जनित वायरस से प्रतिवर्ष 128 से अधिक देशों के लगभग 40 करोड़ लोग संक्रमित होते हैं।

विज्ञान मेला: 12 अभिनव परियोजनाओं के लिए स्कूली छात्र पुरस्कृत

नई दिल्ली, 08 दिसम्बर। आईआईटी दिल्ली में विज्ञान मेले में लक्षद्वीप विद्यालय की दो छात्राओं द्वारा नारियल के पत्तों से कपास जैसे पदार्थ बनाने की विज्ञान परियोजना सहित कुल 12 परियोजनाओं को प्रतिष्ठित इनोवेशन अवार्ड प्रदान किया गया। लक्षद्वीप विद्यालय की इन छात्राओं द्वारा विकसित यह पदार्थ कटे हुए स्थान और घाव को ठीक कर सकता है और संक्रमण को रोक सकता है। इसे अगले वर्ष अमेरिका में इंटेल साइंस एंड इंजीनियरिंग फेयर के लिए टिकट भी प्रदान किया गया।
कवरत्ती द्वीप (लक्षद्वीप) के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के छात्रों नौरीन ताज और कुबेर टी. एन. ने 4-8 दिसम्बर तक आईआईएसएफ के तहत आयोजित आईआरआईएस (एनीशियेटिव फाॅर रिसर्च एंड इनोवेशन इन साइंस) राष्ट्रीय विज्ञान मेले में यह पुरस्कार प्राप्त किया।
लक्षद्वीप की दोनों लड़कियां उन 16 छात्रों (टीम और व्यक्तिगत) में शामिल हैं जिनकी 12 परियोजनाओं को देश के विभिन्न भागों के स्कूलों द्वारा प्रस्तुत करीब 100 परियोजनाओं में चयन किया गया था। इन 12 परियोजनाओं में दिल्ली और कर्नाटक से तीन- तीन स्कूल, महाराष्ट्र से दो स्कूल, और चंडीगढ़, लक्षद्वीप, झारखंड और पश्चिम बंगाल से एक-एक स्कूल शामिल हैं।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी एवं पृथ्वी विज्ञान मंत्री डाॅ.हर्षवर्धन ने सोमवार शाम आईआईटी, दिल्ली में आयोजित समारोह में पुरस्कार स्वरूप एक प्रमाण पत्र और एक पदक प्रदान किए। पुरस्कार विजेताओं को मई 2016 में एरिजोना, फीनिक्स (अमरीका) में आयोजित होने वाले इंटेल साइंस एंड इंजीनियरिंग फेयर में अपनी परियोजनाओं को दिखाने का मौका मिलेगा।
इंटेल की शिक्षा सलाहकार सलोनी सिंघल ने बताया कि भारतीय पुरस्कार विजेता अमेरिका में दो सप्ताह के इंटेल आयोजन में भाग लेंगे जहां वे 78 देशों के स्कूली छात्रों की 1700 परियोजनाओं के साथ प्रतिस्पर्धा में शामिल होंगे। उन्होंने कहा, पहले सप्ताह में प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। दूसरे सप्ताह के दौरान प्रतिभागी वैज्ञानिकों और अमरीकी अधिकारियों के साथ विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर बातचीत करेंगे और अनुसंधान प्रयोगशालाओं और शैक्षणिक संस्थानों का दौरा करेंगे।
पुरस्कार विजेताओं में सर्वश्रेष्ठ विजेता को जेनेवा में नोबेल पुरस्कार विजेता समारोह में भाग लेने का मौका मिलेगा। इसके अलावा, एमआईटी लैब के द्वारा उसके नाम पर किसी मामूली ग्रह का नाम रखा जाएगा। झारखंड में कार्मेल जूनियर क‚लेज स्कूल, जमशेदपुर के एक छात्र, प्रशांत रंगनाथन का चयन उनकी अपनी शोध परियोजना के लिए किया गया था। यह परियोजना जलीय फेरो तरल (लोहे के आक्साइड नैनो कणों से युक्त) का इस्तेमाल कर गेहूं और जौ के अंकुरण और वृद्धि को बढ़ाने पर थी।
एक और दिलचस्प पुरस्कार विजेता परियोजना —त्रिमन्यूरल नेटवर्क (एएनएन) का उपयोग कर कर्नाटक संगीत का कम्प्यूटेशनल विश्लेषण थी। यह पुरस्कार सिंधी हाई स्कूल, बंगलौर के एक छात्र हेमंत एच कुमार ने जीता।
महाराजा अग्रसेन पब्लिक स्कूल, दिल्ली के हर्षित जिंदल और महिमा यादव को माइकोबैक्टीरियम की गैर रोगजनक प्रजाति, माइकोबैक्टीरियम इंडिकस प्रानी की मदद से दमा के इलाज के लिए एक नये ²ष्टिकोण पर आधारित उनकी परियोजना के लिए पुरस्कृत किया गया। उनका अध्ययन क्रोनिक इंफ्लामेट्री बीमारी के इलाज के लिए एक सुरक्षित, सस्ती और सुरक्षित दवा का मार्ग प्रशस्त करता है।
अन्य पुरस्कार विजेताओं में श्रेयस कपूर (माॅडर्न स्कूल, दिल्ली), धृति गौड़ और पुष्कर मंडल (महाराजा अग्रसेन पब्लिक स्कूल, अशोक विहार, दिल्ली), आदित्य भार्गव (विद्या मंदिर, बंगलौर), आदित्य कांत (धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल, मुंबई), सागनिक मजूमदार और अमिक मंडल (हेम शीला म‚डल स्कूल, दुगार्पुर, पश्चिम बंगाल), पार्वती राम (नेशनल पब्लिक स्कूल, इंदिरानगर, बंगलौर), अरविंद —ष्ण रंगनाथन (इकोले मोंडले वल्र्ड स्कूल, मुंबई) और अभिमन्यु कुमार (स्टेपिंग स्टोन्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल, चंडीगढ़) शामिल थे।

बच्चों की सेहत पर असर होता है पिता के पोषक खानपान का

मेलबर्न। बच्चे के उचित विकास के लिए अब तक केवल मां के खानपान को ही जिम्मेदार माना जाता रहा है, लेकिन एक ताजा शोध के अनुसार बच्चे के स्वास्थ्य पर पिता द्वारा सेवन किए जा रहे आहार का भी असर होता है। इस शोध के अनुसार, गर्भधारण से पहले पिता द्वारा लिया गया आहार आनुवंशिक रूप से बच्चे के विकास पर प्रभाव डालता है। मेलबर्न की आरएमआईटी यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों के अनुसार, मां के आहार से बच्चे पर पड़ने वाले प्रभाव का व्यापक रूप से अध्ययन किया गया है, लेकिन पिता के आहार से बच्चे पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन पहली बार किया गया है। मुख्य शोधार्थी एंटोनियो पाओलिनी ने इस शोध के दौरान चूहों पर अध्ययन किया। इसमें से नर चूहों को प्रचूर मात्रा में भोजन दिया गया और उनकी तुलना में दूसरे समूह को 25 प्रतिशत कम कैलोरी वाला आहार दिया। पाओलिनी ने कहा, “गर्भ में रहने के दौरान भले ही बच्चे से अपने पिता का कोई संपर्क नहीं रहता हो, लेकिन उससे पहले ही स्वाभाविक रूप से संतान में पिता के गुण आ जाते हैं। इस अध्ययन में देखा गया कि सीमित आहार लेने वाले चूहों की संतान का वजन सामान्य था।“ शोध में पाया गया कि चूहे के बच्चों में गुणसूत्रों की कार्यप्रणाली में उनके पिता के अनुभवों के आधार पर भिन्नता रही। पाओलिनी के अनुसार, “यह निष्कर्ष बताता है कि एक पीढ़ी के खानपान का असर उसकी अगली पीढ़ी को प्रभावित करता है।“ कम कैलोरी नई पीढ़ी में लड़ने की क्षमता तेज करती है, उद्विग्नता कम करती है और परिवेश से सामंजस्य बिठाने में अधिक साहसी बनाती है। पाओलिनी के अनुसार, “माता-पिता दोनों के लिए यह जरूरी है कि वे अपनी खानपान, शराब और धूम्रपान की आदतों और परिवेश पर विचार करने के बाद ही बच्चे को जन्म देने का फैसला करें, क्योंकि इन सबका उनकी संतान पर सीधा असर पड़ सकता है।“ यह अध्ययन अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान शोध पत्रिका ’साइकोन्यूरोइंडोक्राइनोल‚जी’ के आगामी अंक में प्रकाशित होने वाला है।

समुद्री तापमान बढ़ने से पृथ्वी के आॅक्सीजन स्तर में गिरावट हो सकती है

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लंदन। वैज्ञानिकों ने दुनिया को चेताया है समुद्री तापमान बढ़ने से पृथ्वी के आॅक्सीजन स्तर में लगातार गिरावट हो रही है। जिसके परिणामस्वरूप कुछ सालों में इंसान और जानवर की मृत्यु दर में व्यापक तौर पर इजाफा हो सकता है। दुनिया के महासागरों के तापमान में 6 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि देखी गई है। इस आधार पर वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की है कि साल 2,100 तक आॅक्सीजन का उत्पादन रुक सकता है क्योंकि समुद्री तापमान बढ़ने से प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बाधित होती है, जिसके द्वारा फाइटोप्लैंकटन (पादप प्लवक) कार्बन डाइआॅक्साइड का उपभोग और आॅक्सीजन का उत्पादन (निस्तारण) करते हैं। फाइटो प्लैंकटन को एक सूक्ष्म शैवाल (माइक्रो एल्गी) और सूक्ष्म जीव के तौर पर जाना जाता है। यह मीठे और खारे पानी के लगभग सभी स्रोतों में निवास करते हैं।
इंग्लैड की लिसेस्टर यूनिवर्सिटी के मुख्य शोधविज्ञानी सर्गेई पेट्रोवस्की के अनुसार, “समुद्री फाइटोप्लैंकटन पृथ्वी की लगभग दो-तिहाई अक्सीजन का निर्माण करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इनके खत्म होने के परिणामस्वरूप हमारे सामने वैश्विक स्तर पर वायुमंडलीय आॅक्सीजन की कमी का संकट खड़ा हो जाएगा।“ शोधार्थियों के एक समूह ने समुद्र में आॅक्सीजन उत्पादन के लिए एक नया माॅडल विकसित किया है, जो प्लैंकटन समुदाय की अक्सीजन उपभोग और निस्तारण जैसी बुनियादी प्रक्रियाओं की गणना करेगा। पेट्रोवस्की ने बताया, “पिछले दो दशकों में ग्लोबल वार्मिग ने विज्ञान और राजनीति का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है, इससे होने वाले परिणामों के बारे में बहुत कुछ बताया जा चुका है। लेकिन अंदाजा है कि अंटार्टिका में बर्फ के पिघलने से एक विनाशकारी वैश्विक बाढ़ आ सकती है। “ यह अध्ययन पत्रिका ’मैथेमेटिकल बायोलाॅजी’ में प्रकाशित हुआ है।

तैयार हुईं मानव लीवर की क्रियाशील कोशिकाएं

न्यूयार्क।एजेंसी, (लीवर) की बीमारियों से जूझ रहे लोगों के इलाज में भविष्य में चिकित्सकों को बड़ी सहूलियत मिलने वाली है, क्योंकि शोधकर्ताओं ने एक ऐसी प्रक्रिया का विकास किया है, जिससे प्रयोगशाला में मानव लीवर कोशिकाओं की संख्या तेजी से बढ़ाई जा सकती है, वह भी उसके गुणों से समझौता किए बगैर। इजरायल में हिब्रू यूनिवर्सिटी अफ जेरूसलम में इस अध्ययन के मुख्य लेखक याकोव नाहमियास ने कहा, “यह अध्ययन लीवर पर हो रहे अनुसंधानों में मील का पत्थर साबित होगा।“ यह अध्ययन विभिन्न तरह के लिवर-संबंधी अनुसंधानों और प्रत्यारोपण के लिए इंतजार कर रहे लीवर के मरीजों के लिए जैव-.कुत्रिम लीवर के निर्माण में मददगार साबित होगा। नाहमियास के अनुसार, हमारी प्रौद्योगिकी हजारों प्रयोगशालाओं को लीवर संबंधी बीमारियों, वायरल हेपेटाइटिस, दवा विषाक्तता और लीवर कैंसर पर अध्ययन को सक्षम करेगी, वह भी बिना अतिरिक्त खर्च के। मानव हेपैटोसाइट्स के बेहद कम आपूर्ति व बिना अपना गुण खोए इसकी संख्या बढ़ाने की क्षमता वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती रही है। यह नई विधि ’अपसाइट प्रोसेस’ मानव हेपैटोसाइट्स को संख्या बढ़ाने की अनुमति देती है, जिसके परिणामस्वरूप प्रत्येक लीवर कोशिकाओं से असंख्य कोशिकाओं का निर्माण होता है। जर्मनी की बायोटेक्नोलजी कंपनी के जरिस ब्रैसपेनिंग ने कहा, “यह अध्ययन स्वास्थ्य जगत के लिए क्रांतिकारी है। यह हमें विभिन्न दाताओं से लीवर कोशिकाओं को उत्पन्न करने की क्षमता प्रदान करता है। इसके अलावा रोगी से रोगी परिवर्तनशीलता और विशेष स्वाभाव विषाक्तता (पेशंट टू पेशंट वेरियेविलिटी) का अध्ययन करने में भी सक्षम कर रहा है।“ यह अध्ययन ’नेचर बायोटेक्नोलजी’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

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